हादसा होने के बाद ही क्यों जागती हैं सरकार - डा. संदीप कटारिया

 


क्राइम रिफोर्मर एसोसिएशन  के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. संदीप कटारिया ने बताया कि पूरा देष मानूसन के आने के लिए मन्नतें मांगता है। इंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए लोग पानी की छबील तथा भंडारे तरह-तरह के जतन किए जाते हैं। देष की अर्थव्यवस्था खेती आधारित होने के कारण राश्ट्र का विकास बरसात पर टिका है, लेकिन बरसात क्या आती है मानो देष के कई शहरों में मुसीबत आ जाती है। ऐसी ही आपदा देष की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले मुंबई के डोंगरी में आई। जहां बरसात के चलते 100 साल पुरानी चार मंजिला इमारत भरभरा कर ढह गई। बरसात के कारण होने वाला यह कोई पहला हादसा नहीं है। इससे पहले मुम्बई, हिमाचल, उत्तर प्रदेष और पुणे में भी ऐसी खबरें हैं। जर्जर भवन हर साल मासूमों के लिए बारिष के यमदूत क्यों साबित हो रहे हैं? क्या राज्य सरकारों और अधिकारियों को ऐसे भवनों की जानकारी नहीं है। क्यों नहीं मानसून से पहले यह भवन खाली करवाए गए। क्या बरसात के कारण ऐसे भवन को गिरने का इंतजार किया जाता है। नगर निगम हर साल गृहकर जारी करने के लिए भवनों का सर्वे करवाता है। यह भी जांच की जाती है कि जर्जर भवन कितने और किस हाल में हैं। इसके बावजूद कोई कार्रवाई न होना पूरी व्यवस्था पर प्रष्नवाचक चिहन लगाता है। इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए। कोई भी हादसा हाने के बाद जांच करवानेे की खानापूर्ति करने वाली व्यवस्था से हम कब तक दो-चार होते रहेंगे। यह पहली बार नहीं है कि ऐसे हादसे हुए हों। मानसून की बरसात के आते ही ऐसी खबरें चारों ओर आनी शुरू हो जाती हैं। चाहे शहर और राज्य कोई भी हो, बरसात आने से पहले तक प्रषासन हर तरह के पुख्ता प्रबंधों को दावा करता है। बरसात, जलभराव और बाढ़ से बचाव के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है, लेकिन मानसून की पहली बरसात आते ही सारे दावे हवा हो जाते हैं। पूरे देष में यही सब हो रहा है। बरसात आते ही शहरों में जलभराव हो जाता है, गाड़ियां सड़कों पर रंगने लगती है। ऐसा नहीं है कि अब बरसात अधिक होने लगी है। बीच पच्चीस साल पहले तक अब से अधिक बारिष होती थी, कई-कई दिनों तक झड़ी लगी रहती थी, लेकिन तब ऐसी घटनाएं कम ही सामने आती थी। पिछले कुछ सालों में शहरों के विस्तार और आधुनिकीकरण पर जोर है, गगनचुंबी इमारतें बन गई हैं। इनमें सुविधा सामग्री का उपयोग होने लगा है मगर जब भी थोड़ी सी अधिक बरसात होती है तो जलभराव होने से व्यवस्था की पोल खुल जाती है, क्योंकि शहरीकरण के चलते जल निकासी पर ध्यान हीं नहीं दिया गया। जहां जल निकासी के लिए नाले बनाए भी गए हैं तो वे गंदगी से अटे पड़े हैं। उनकी साफ-सफाई की तरफ किसी का ध्या नही नहीं है। अभी तो बरसात शुरू हुई है। सावन का महीना से बरसात शुरू होती है। तब भवन गिरने, जलभराव के बाद मौसमी बीमारियां फैलने की खबरें भी आनी शुरू हो जाएंगी। मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसे बुखार जमकर प्रहार करेंगे, क्योंकि जिन क्षेत्रों में जलभराव हो रहा है, वहां पानी के साथ बीमारियां पनप रही है। नगर निकाय अफसरों के साथ स्वास्थ्य अमला भी गहरी नींद में है। न तो बीमारियों से बचाव का कोई प्रबंध नजर आ रहा है और न ही जागरूकता का अभियान चल रहा है। इसके लिए जिम्मेदार कौन है, यह तो जांच की खानापूर्ति में देखा जाएगा, फिलहाल अपना ध्यान खुद रखें। किसी के भरोसे न रहंे। घर के आसापास जलभराव न होने दें, कूलर का पानी बदलते रहें। बीमारी के लक्षण नजर आते ही तुरंत डाक्टर को दिखाएंगे। खुद जागते रहें, क्योंकि अफसरषाही सो रही है।


 


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