मन का बोझ उतर जाए तो सफलता की उड़ान तय है - डा. संदीप कटारिया

क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. संदीप कटारिया ने बताया कि पेंगुइन एक सुंदर पक्षी है, लेकिन उड़ नहीं सकता। एक वैज्ञानिक अध्ययन से पता चलता है कि लाखों साल पहले पेंगुइन भी काफी ऊंचाई तक उड़ पाते थे। और भी कई पक्षी हैं जिनके पंख तो हैं, लेकिन इसके बावजूद वे उड़ नहीं पाते। प्रष्न उठता है, क्या सिर्फ पंखों के जरिए ही उड़ा जा सकता है? पंख उड़ने में सहायक अवष्य होते हैं लेकिन यह भी सच है कि पक्षियों की हड्डियां अंदर से खोखली और बहुत हल्की होती हैं। इसी कारण वे आसानी से उड़ पाते हैं। पहले पेंगुइन की हड्डियां भी बहुत हल्की होती थीं जिससे वे आसानी से उड़ पाते थे। बाद में उनकी हड्डियां भारी और ठोस होती चली गईं और एक समय ऐसा आया जब उनकी हड्डियां इतनी भारी और ठोस हो गईं कि उनके लिए उड़ना असंभव हो गया।
मनुष्य के उड़ने के संबंध में भी यह बात उतनी ही सही है। हालांकि मनुष्य के उड़ने से तात्पर्य यह नहीं है कि मनुष्य पहले पक्षियांे की तरह ही उड़ता था और अब हड्डियां भारी और ठोस हो जाने के कारण नहीं उड़ पाता। मनुष्य का उड़ना एक ओर उसकी प्रसन्नता व उन्मुक्तता का प्रतीक है तो दूसरी ओर उसके भौतिक व आध्यात्मिक विकास का। प्रायः तेज दौड़ने को ही उड़ना कह दिया जाता है। अब यह दौड़ जीवन के किसी भी क्षेत्र में हो सकती है। जब हमारी दौड़ अथवा उड़ान पर अचानक विराम लग जाता है तो उसका कारण मात्र हमारे पंखों की षिथिलता अथवा प्रयासांे में कमी नहीं होता अपितु हमारी आतंरिक बनावट इसके लिए अधिक उŸारदायी होती है। जैसे पक्षियों की हड्डियांे के आकार और घनत्व से उनके उड़ने की क्षमता निर्धारित होती है, उसी प्रकार मनुष्य के मनोभावों की अवस्था ही उसके उड़ने, आगे बढ़ने अथवा उपयोगी कार्य करने की क्षमता को निर्धारित करती है।
आध्यात्मिक उन्नति तो पूर्ण रूप से व्यक्ति के मनोभावों की उदाŸा अवस्था पर ही निर्भर करती है। जिस प्रकार अत्यधिक ऊंचाई पर अधिक सामान लेकर चढ़ना संभव नहीं होता, उसी प्रकार अंदर से भारी होने पर मनुष्य के लिए भी ऊंचा उड़ना मुमकिन नहीं होता। कई बार किसी व्यक्ति को यह भी कह दिया जाता है कि क्यों इतने भारी हो रहे हो? यहां भारी से तात्पर्य “ारीर के वनज से न होकर उसके दूशित मनोभावों से या अहंकार से होता है। अहंकार के भार से युक्त व्यक्ति कभी आध्यात्मिक ऊंचाईयों को स्पर्ष नहीं कर सकता। यदि उसके अंदर नकारात्मक और घातक विचारों का कूड़ा-करकट भरा है तो उसे किसी भी स्थिति में प्रसन्नता नहीं मिल सकती।
हमें ऊंचा उड़ने के लिए प्रसन्न रहना होगा और प्रसन्न रहने के लिए अपने मन को विकारों से मुक्त रखना होगा। एक पक्षी स्वेच्छा से न तो अपनी हड्डियों के घनत्व को कम कर सकता है और न उन्हें अंदर से खोखला बना सकता है, लेकिन मनुष्य के लिए अपने मनोभावों को बदलकर उन्हें सुंदर व सकारात्मक बनाना बेषक सरल न हो, लेकिन असंभव तो कदापि नहीं होता। यदि मन में व्याप्त विकारों के परिमार्जन का यह सिलसिला एक बार प्रारंभ हो जाता है तो पक्षियों की तरह ऊंचे उड़कर न केवल इस संुदर संसार के सौंदर्य का अनुभव किया जा सकता है अपितु आध्यात्मिक जगत की ऊंचाइयों को भी निष्चित रूप से स्पर्ष किया जा सकता है।


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