आर्थिक मंदी की वजह से फ्यूल की मांग पर असर - डॉ. संदीप कटारिया






क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ . संदीप कटारिय ने बताया कि ऑटो सेक्टर में मंदी का असर अब फ्यूल की डिमांड पर भी देखने लगा है सितम्बर 2019 में फ्यूल की डिमांड घटकर 2 साल के निचले स्तर पर पहुंच गइ है। हालांकि सितंबर में पेट्रोल और एलपीजी की मांग में इजाफा हुआ है। जबकि डीजल की डिमांड घटी है।





पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकडों के मुताबिक सितंबर में पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का खपत गिरकर 1.601 करोड़ टन पर आ गया है, जबकि यह जुलाई 2017 के 1.606 करोड़ टन से कम है।


आर्थिक सुस्ती का असर दरअसल भारत में फ्यूल के तौर पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल डीजल का होता है, लेकिन इसका इस्तेमाल सितंबर 3.2 फीसदी घटकर 58 लाख टन रह गया है। रोड कंस्ट्रक्षन में इस्तेमाल होने वाले ठपजनउमद का भी खपत 7.3 फीसदी गिरकर 343000 टन रह गया है। अगर बिक्री की बात करें तो सितंबर में फ्यूल ऑयल की सेल 3.8 फीसदी घटकर 525000 टन रह गई है हालांकि इस गिरावट ने एलपीजी और पेट्रोल की डिमांड में तेजी के असर को कम कर दिया है।


पेट्रोल की बिक्री सितंबर में 6.2 फीसदी बढ़कर 23.7 लाख टन रही, लेकिन जेट फ्यूल या एटीएफ की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई है और सितंबर से इसकी सेल 1.6 फीसदी गिरकर 666000 टन रह गई है। इस दौरान एलपीजी की खपत 6 फीसदी बढ़कर 21.8 लाख टन पर पहुच गई है। जबकि केरोसिन की मांग करीब 38 फीसदी गिरकर 176000 टन रह गई है।








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