धरती के संरक्षण के लिए पर्यावरण की शिक्षा जरूरी - डॉ. संदीप कटारिया

क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संदीप कटारिया ने बताया कि शुद्ध वायु, जल प्रकाष एवं अन्याय अवयवों के संतुलन से ही धरा पर विद्यमान जीवन तत्व की रक्षा संभव है। शास्त्रों में कहा गया है कि प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनाों  के प्रति हमारी उपभोग की नहीं अपितु उपयोग की वृत्ति हो। भारतीय परंपराओं का धरती के संरक्षण से पुराना संबंध है। प्राचीन काल से ही हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाते हुए चलने का संस्कार मिला है। यदि ये परंपराएं न होतीं तो आज हमारे देश की स्थिति भी गहरे संकट के कगार खड़े किसी पश्च्मिी देश की तरह होती।



भौतिक विकास के पीछे दौड़ रही दुनिया को अब यह अहसास हो रहा है कि इस चमक-दमक के लिए क्या कीमत चुकाई जा रही है। आज ऐसा कोई देश नहीं है जो धरती के संरक्षण पर मंथन नहीं कर रहा हो। भारत भी चिंतित है, लेकिन जहां दूसरे देश भौतिक चकाचैंध के लिए अपना सब कुछ लुटा चुके हैं वहीं हमारे पास आज भी बहुत कुछ है। पष्चिम के देषों ने प्रकृति को हद से ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। वैसे देखा जाए तो प्रकृति को नुकसान पहुंचाने से रोकने के लिए पष्चिम में मजबूत परंपराएं भी नहीं थीं।


डॉ. कटारिया ने बताया कि हमारे यहां प्रकृति पूजन को प्रकृति संरक्षण के रूप में मान्यता है। हमारे यहां पेड़-पौधों, नदी, पर्वत, ग्रह, नक्षत्र अग्नि, वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिश्ते प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिष्ते जोड़े गए हैं। पेड की तुलना संतान से की गई है तो नदी को मां स्वरूप माना गया है। ग्रह, नक्षत्र, पहाड़ और वायु देवरूप माने गए हैं। हमारे शास्त्रों ने हमें जीवन जीने की वैज्ञानिक पद्धति बताई है। इसके पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य अवष्य छिपा हुआ है। इन रहस्यों को प्रकट करने की दिशा में कार्यहोना चाहिए। जियो और जीने दो भारतीय संस्कृति का मूल आधार है और यह सह अस्तित्व का सिद्धांत ही हमें प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। हमारे ऋशि मुनि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है। इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है जल से वृक्ष है, जल से अन्न है और अन्न जीवन है। जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वन और जंगलों से ही है।


पृथ्वी सभी वनस्पतियों की माता और मेघ पिता हैं क्योंकि वर्शा के रूप में पानी बहाकर यह पृथ्वी में गर्भाधान करता है। वेदों में इसी तरह पर्यावरण का स्वरूप तथा स्थिति बताई गई है और यह भी बताया गया है कि प्रकृति और पुरूश का संबंध एक दूसरे पर आधारित होता है। पर्यावरण पृथ्वी पर जीवन के पोशण के लिए प्रकृति द्वारा दी गई अमूल्य भेंट है। पर्यावरण संरक्षण आज जीवमात्र के कल्याण के साथ साथ प्रकृति की सुरक्षा के लिए भी अति आवष्यक हो गया है।


पर्यावरण परिवेश को इस स्थिति तक पहुंचाने वाला मनुश्य है और उसे वापस पूर्व स्थिति में लाने की क्षमता और विवेक भी उसी में है। अतः आज के इस युग में धरती के संरक्षण की षिक्षा अति आवष्यक और महत्वपूर्ण हो गई है। बिना पर्यावरण षिक्षा के धरती के संरक्षण की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यदि समय रहते इस षिक्षा की और जनमानस का ध्यान आकर्शित नहीं किया गया तो प्रलय का आगमन अवष्यंभावी हो जाएगा।


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