निर्यात और विदेशी बाजार

घरेलू मांग में कमी आने पर प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाएं निर्यात बाजारों की ओर रुख करती हैं। तेज गति से विकास करने वाला हर देश सफल निर्यातक होता है। हाल के वर्षों में देश में जो मंदी आई है उसकी बुनियादी वजहों में से एक है निर्यात को गति प्रदान करने में नाकामी। जीडीपी के संदर्भ में निर्यात में तेजी से गिरावट आई है। निर्यात को गति दिए बिना अर्थव्यवस्था मंदी से नहीं उबर सकती। सारी बातचीत आयात प्रतिस्थापन और शुल्क दरों में इजाफा करने के इर्दगिर्द केंद्रित है। शंकालुओं का कहना है कि वैश्विक स्तर पर कारोबार मंदा है, ऐसे में निर्यात के प्रति जोश जगाना मुश्किल है। परंतु हमारे देश में वस्त्र व्यापार भी स्थिर है। जबकि वियतनाम, इंडोनेशिया और कंबोडिया में तेज निर्यात वृद्घि देखने को मिली है।



बांग्लादेश भी भारत से आगे है। इसकी वजह यह है कि ये देश चीन की कमी पूरी कर रहे हैं। चीन हर महीने 20 अरब डॉलर मूल्य के वस्त्र निर्यात करता था जो अब घटकर 12 अरब डॉलर रह गया है (भारत को यह आंकड़ा पाने में नौ महीने लगते)। इस कमी को पूर्वी एशिया के देश और बांग्लादेश पूरा कर रहे हैं। भारत के पास इसका बहुत मामूली हिस्सा आया है। बांग्लादेश का निर्यात भारत के निर्यात का 60 फीसदी हुआ करता था लेकिन अब यह उलट कर दोगुना हो चुका है। वियतनाम भी हमसे काफी आगे हो गया है। विडंबना यह है कि बांग्लादेश कपास, धागा और कपड़ा भारत से आयात करता है। वस्त्र निर्यात, व्यापार घाटे को कम करता है, साथ ही कई जटिल समस्याओं को भी हल करता है। किसी भी अन्य बड़े औद्योगिक क्षेत्र की तुलना में यह रोजगार को अधिक बढ़ावा देता है।


वाहन या इंजीनियरिंग क्षेत्र की तुलना में यह 10 गुना तक और रसायन तथा पेट्रोकेमिकल क्षेत्र की तुलना में 100 गुना अधिक रोजगार प्रदान करता है। इस उद्योग की बिक्री का काफी हिस्सा वेतन-भत्तों में जाता है जो घरेलू खपत की मांग को बढ़ावा देता है। इस क्षेत्र के अधिकांश कर्मी महिलाएं हैं जिनकी श्रम शत्तिफ़ में कम होती भागीदारी चिंता का विषय बन चुकी है। चूंकि कपड़ा एवं वस्त्र क्षेत्र पहले ही कुल विनिर्माण रोजगार के एक तिहाई के बराबर है इसलिए वस्त्र निर्यात को बढ़ावा देने मात्र से विनिर्माण को जबरदस्त गति मिलेगी। अभी भी अवसर समाप्त नहीं हुआ है क्योंकि चीन के निर्यातकों को अमेरिकी शुल्क वृद्घि (अभी वस्त्र क्षेत्र पर लागू नहीं) के खतरे के अलावा बढ़ती लागत और घटते मार्जिन से जूझना पड़ रहा है। भारत की सबसे बड़ी दिक्कत समुचित परिस्थितियों का अभाव है।


बांग्लादेश अत्यंत कम विकसित देश है और उसे यूरोप, कनाडा और जापान के बाजारों में शुल्क मुत्तफ़ पहुंच हासिल है। वियतनाम और श्रीलंका को भी मुत्तफ़ व्यापार समझौतों के तहत यूरोप में ऐसी पहुंच प्राप्त है। यूरोप में बांग्लादेश की शुल्क मुत्तफ़ पहुंच 2024 में समाप्त हो जाएगी लेकिन वह मुत्तफ़ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर कर सकता है। अत्यंत कम मार्जिन वाले कारोबार में शुल्क दर में 10 फीसदी की बाधा से बहुत बड़ी दिक्कत हो सकती है। भारत ने यूरोपीय संघ के साथ व्यापार को संतुलित किया है लेकिन जापानी कार कंपनियों की लॉबीइंग के चलते भारत मुत्तफ़ व्यापार समझौता नहीं कर सका है। सरकार ने श्रम कानूनों में बदलाव किया है और भविष्य निधि खातों में योगदान के जरिये भी उसने बांग्लादेश के साथ वेतन का अंतर कम किया है। नई विनिर्माण इकाइयों के लिए 17 फीसदी की कर दर की पेशकश के साथ यह अंतर और कम हुआ है। परंतु निर्यातकों को कमजोर बुनियादी सुविधाओं और बंदरगाहों पर समय खपाऊ प्रक्रिया से भी गुजरना पड़ रहा है। रुपये के अधिमूल्यन में सुधार भी उतना ही अहम है।


वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने एक साक्षात्कार में कहा है कि वह यह नहीं समझ पा रहे कि सस्ता रुपया कैसे मददगार होगा जबकि देश का व्यापार घाटा खासा बढ़ा हुआ है। उन्हें यह भी देखना चाहिए कि सन 1996 में रुपये के अवमूल्यन के बाद व्यापार के आंकड़ों में समय के साथ सुधार आया जबकि आयात कम हुआ। चार वर्ष में भारी भरकम व्यापार घाटा 80 फीसदी तक पूरा हो गया था। सन 1991 के अवमूल्यन के पहले पांच वर्ष का औसत व्यापार घाटा निर्यात का 40 फीसदी था लेकिन अवमूल्यन के बाद इसमें गिरावट आई और तकरीबन दशक भर तक यह काफी कम बना रहा। आज उतनी तीव्र गिरावट संभव नहीं है क्योंकि अमेरिका उन देशों पर नजर रखता है जिनके बारे में उसे लगता है कि वे मुद्रा दर के साथ छेड़छाड़ करते हैं। परंतु इससे निपटने के और भी तरीके हैं। निर्यात वृद्घि जल्द हासिल करने के लिए रुपये का तत्काल अवमूल्यन आवश्यक है।