फैसला करने से पहले स्वयं पर यकीन करना सीखें - डॉ. संदीप कटारिया

क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संदीप कटारिया ने बताया कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए क्या करना चाहिए, इस बिंदु पर आकर हम कुछ समय के लिए ठहर जाते हैं। किसी उचित फैसले पर पहुंचना आसान नहीं रह जाता है। जाहिर है कि उस क्षण हम सारी संभावनाओं को टटोलने लगते हैंं सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों ही विचार दिग्भ्रमित करने लगते हैं। मन में एक डर भी पैदा हो जाता है कि गलत निर्णय कही पथच्युत न कर दे। ऐसे समय में किसी को परेषान नहीं होना चाहिए। यह एक स्वाभाविक वृŸिा है। न चाहते हुए भी इसका सामना करना पड़ता है। इसमें हमारी सोच और सामथ्र्य की परीक्षा भी होती है। जो परीक्षा से घबराता है, वह पहले ही असफलता की इबारत लिखना शुरू कर देता है। उसका न खुद पर और न किसी और पर विश्वास रह जाता है।


तय मानिए कि जीवन में आगे जाने के लिए किसी न किसी विष्वास की जरूरत होती है। यह विपरीत परिस्थिति में संबल होता है। लेकिन तब एक सवाल उठता है कि किस पर करें विष्वास? आदमी इसी दोराहे पर आकर अटक जाता है। सही विष्वास जहां सही लक्ष्य की ओर ले जाता है, गलत विष्वास उम्र भर के लिए भटका देता है। यही समय है जब गहन चिंतन की आवष्यकता होती है। अक्सर यह होता है कि विष्वास का निर्णय करते समय हम तुरंत दूसरे पर भरोसा कर लेते हैं। किसी पंथ, संप्रदाय को पकड़ लेते हैं। गुरू के नाम पर किसी का भी अंध-भक्त हो जाते हैं। आज परिणाम सबके सामने है कि वे कथित गुरू या संप्रदाय उस विष्वास का किस तरह “ाोशण-दोहन कर रहे हैं। हम भूल जाते हैं कि हमारे महापुरूशों ने क्या संदेष दिया है!


महावीर हों या बुद्ध, नानक हांे या क्राइस्ट, हर किसी ने कहा है, 'तुम अपने पर विष्वास करो।' बुद्ध ने यहां तक कहा कि स्वयं दीपक बनो। महावीर ने अपने से सत्य की खोज की बात कही, 'सत्य को पाना अपने को पाना है और अपने को खोना सत्य को खोना है। इसलिए तुम अपने से जुड़ो' लेकिन इस समय की दुविधा यह है कि हम खुद को छोड़कर हर किसी से और हर कुछ से जुड़ जाते हैं। इसकी एक खास वजह है। खुद से जुड़ने का मतलब होता है अपने अंदर के आईने में झांकना, जो हमारा पूरा चेहरा हू-ब-हू दिखा देता है। हमारे मन का चोर भयभीत हो जाता है कि आईना हमारी कमियां बताने लगेगा। तब यह याद नहीं रह पाता है कि वह हमारे आंतरिक सौंदर्य के भी दर्षन कराएगा। हम उससे मुंह छिपाने की कोषिष में लग जाते हैं।


जाहिर है कि हर किसी के भीतर देव और दानव, दोनांे हैं। दोनों के बीच संघर्श चलता ही रहता है। कभी कोई जीतता है तो कभी कोई। लेकिन अंतिम जीत देवता की ही होती है। यह जानते-समझते हुए भी अगर पराजय-बोध के षिकार होते हैं तो यह समझिए कि हम अपने लिए सुखद राह नहीं चुन पाएंगे। इसलिए जरूरी है कि किसी भी निर्णय के पूर्व हम खुद पर विष्वास करना सीखें। यह आत्म-विजयी बनने में मदद करेगा। महावीर ने बहुत अच्छी बात कही है, 'लाखों योद्धाओं पर विजय पाना सरल है, लेकिन बहुत कठिन है अपने पर विजय पाना।' यह कठिन इसलिए है कि हमें स्वयं पर भरोसा नहीं है। हर महापुरूश ने आदमी के आत्मविष्वास को जगाने की कोषिष की है ताकि हम जगें और सही-गलत को समझ सकें। जिस दिन हम खुद से जुड़ जाएंगे, पूरे संसार से जुड़ जाएंगे।


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