देश को हिंसा की आग में झाकने के पीछे कौन - डॉ. संदीप कटारिया

क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संदीप कटारिया ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में देश ने कई बड़े बदलाव देखें हैं, कई महत्वपूर्ण कानून बने हैं। जम्मू-कश्मीर को देश से अलग करने वाली धारा 370 और 35ए को खत्म कर दिया गया। पूरा देश एक हो गया। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बन गए।  जम्मू-कश्मीर में विधानसभा होगी, ललद्दाख में विधानसभा नहीं होगी। जम्मू-कश्मीर सरकार का कार्यकाल अब छह साल का नहीं, बल्कि देश के अन्य राज्यों की तरह पांच वर्श का ही होगा। भारत का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर में नौकरी भी कर सकेगा, उद्योग लगा सकेगा। वहां की महिलाओं पर से पर्सनल कानून बेअसर हो जाएगा। अब पांच अगस्त को गृहमंत्री अमित शाह ने यह विधेयक संसद में रखा तो कांग्रेस समेत उसके सहयोगी दलों ने जमकर हंगामा किया। इसे संविधान और मुस्लिम विरोधी बताते हुए खून की नदियां बह जाने की धमकियां दी गई। जबकि विधेयक पास होते ही पूरे देश ने खुशियां मनाईं। लोगों ने मिठाई बांटकर एक-दूसरे को बधाई दी। देश में उत्साह ठीक वैसा ही था, जैसा आजादी मिलने के बाद देखा गया था। धारा 370 खत्म हो जाने के बाद न केवल आतंकी घटनाओं में कमी आई, बल्कि पत्थरबाजी पर भी लगाम लग गई। पूरे देश ही नहीं जम्मू-कश्मीर के लोगों ने भी सरकार के इस फैसले को सिर-आंखों पर लिया। कांग्रेस की सारी आशंकाएं धरी की धरी रह गईं, घाटी में धीरे-धीरे वहां कानून व्यवस्था पटरी पर लौट आई। ऐसा ही तीन तलाक बिल पर भी हुआ। 30 जुलाई को जब यह बिल राज्यसभा में पहुंचा तो कांग्रेस व उसके सहयोगी दलों ने खूब हंगामा किया। इसे मुस्लिम विरोधी बताकर देश में विद्रोह तक कि आशंका जताई गईं, जब बिल सदन से पास हुआ तो सबसे ज्यादा खुशी मुस्लिम महिलाओं ने मनाई। इस बिल ने उन्हें न केवल प्रताड़ना से आजादी दिलवाई, साथ सिर उठाकर पुरूश प्रधान मानसिकता से टकराने का हौसला भी दिया। जो लोग देश बंट जाने और मुस्लिम तुश्टिकरण के आरोप लगाकर बिल का विरोध कर रहे थे, उन्हें करारा तमाचा लगा। ऐसा ही एक और मौका अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दौरान भी आया। जब इस मामले की सुनवाई हो रही थी तो राजनीतिक स्तर पर तरह-तरह के भ्रम फैलाए गए। कांग्रेस के वरिश्ठ नेता और मुस्लिम पक्ष के वकील कपिल सिब्बल ने तो चुनाव के बाद सुनवाई करने की भी अपील की थी। आशंका जता रहे थे कि फैसला आने पर ऐसा होगा, वैसा होगा। पांच जजों चीफ जस्टिस रंजग गोगाई, जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े, जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूशण और जस्टिस अब्दुल नजीर की बैंच ने फैसला सुनाया तो पूरे देश ने खुशी मनाई। दंगा-फसाद तो दूर की बात लोगों ने एक-दूसरे के गले मिलकर बधाइयां दी। कई लोगों ने इसे मुस्लिम विरोधी बताकर भावनाएं भड़काने का प्रयास किया, लेकिन आम जनमानस ने इन कोशिशों को ठुकरा दिया। अब नागरिकता बिल पर ऐसी नापाक कोशिशों को परवान चढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह संसद में ही स्पश्ट कर चुके हैं कि यह कानून नागरिकता छिनने का नहीं, बल्कि देने का है। इसके बावजूद पूर्वोत्तर, पं. बंगाल और दिल्ली को हिंसा की आग में क्यों सरकारी संपत्ति जलाई जा रही है, कौन है जिसे हिंसा में फायदा नजर आ रहा है। अगर सरकार पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धर्म के नाम पर प्रताड़ित हुए हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता देने जा रही है तो कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के पेट में दर्द क्यों हो रहा है। क्यों इसे मुस्लिम विरोधी बताकर लोगों को भड़काया जा रहा है। क्यों देश को हिंसा की आग में झोंका जा रहा है। जब संसद ने बिल पास कर दिया है तो वे क्यों बार-बार सर्वोच्च अदालत जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबड़े ने ठीक ही कहा है कि जब शांति होगी तभी मामले को सुनेंगे। अगर सड़क पर उतरना है तो हमारे पास नहीं आओ। तोड़फोड़ जारी रही तो हम मामले को नहीं सुनेंगे। यह अपने आप में अहम टिप्पणी है और उपद्रव फैलाने वालों के लिए कड़ी चेतावनी भी।


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