जल संरक्षण के लिए जनभागीदारी आवश्यक - डॉ. संदीप कटारिया


क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संदीप कटारिया ने बताया कि देश में पेयजल संकट लंबे समय से है। पानी की प्रचूर उपलब्धता के बावजूद देश में पेयजल का संकट होना सरकार की उदासीनता का परिचायक है। आजादी के बाद से कभी भी पेयजल के संकुचित वितरण पर सरकार की ओर से प्राथमिकता के आधार पर ध्यान नहीं दिया गया। इसे या तो नगर निकायों या राज्य सरकारों के भरोसे छोड़ दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि जल के वितरण पर केंद्रीय स्तर पर नियमन नहीं हो सका, जिसके चलते शुद्ध पेयजल के नाम पर बोतलबंद पानी का बाजार पनपा, जिसने देश के भूजल का बेहतरीन दोहन किया है। देश में पानी माफिया का तंत्र इतना मजबूत हो गया है कि सरकार के लिए भी वह चुनौती बन गया है। आज देश के अधिकांश हिस्सों में भूजल स्तर खतरनाक सीमा से भी नीचे चला गया है। देश की एक बड़ी आबादी के पास पीन का पानी नहीं बचा है। हर साल किसी न किसी क्षेत्र में सूखे का संकट आता है। महाराश्ट्र इसका बड़ा उदाहरण है। आगरा में हर वर्ग को पानी खरीद कर पीना पड़ता है। तालाब-पोखर के रूप में देशभर में वर्शाजल संरक्षण का संजाल था, जो हमारी सामाजिक संस्कृति का हिस्सा था, लेकिन “ाहरीकरण व आधुनिकता के दौर में तालाब-पोखरों की संख्या कम होती गई। अभी साल-दो साल में जब पेयजल संकट गहरा हुआ, तो प्रधानमंत्री मोदी का इस ओर ध्यान गया और उन्होंने अलग से जलशक्ति मंत्रालय का गठन किया और 2024 तक सबको पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय किया। देश में पहली बार कंद्रीय स्तर पर पेयजल संकट को एक मुद्दे के तौर पर एड्रेस किया गया है। महामना मदन मोहन मालवीय व अटल बिहारी वाजपेयी जयंती पर पीएम ने लोगों से पानी बचाने की अपील की। पानी की उपलब्धता के मामले में भारत विष्व के कई अग्रणी देशों में शुमार है। देश में नदियों का संजाल है। खास बात है कि उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पष्चिम सभी हिस्सों में नदियों का नेटवर्क है। झरनों की सख्या भी काफी है, देश तीन हिस्से से समुद्र से घिरा है। देश के पास खारा पानी  को मीठे पानी में तब्दील करने की सस्ती तकनीक भी है। इजरायल जैसे मित्र भी हैं, जिसके पास समुद्री जल से पेयजल बनाने की तकनीक व उसे वितरित का अनुभव है, इसलिए जरूरत केवल अपने जल स्त्रोत के उचित प्रबंधन की है। 1999 से 2004 के बीच अटल बिहारी सरकार देश मे जल के असमान वितरण, सिंचाई की समस्या व पेयजल संकट को दूर करने के लिए नदी जोड़ो प्रस्ताव लेकर आई थी। सरकारी उदासीनता के चलते नदी जोड़ों अभियान सिरे नहीं चढ़ा। मौजूदा केंद्र सरकार ने पेयजल संकट दूर करने की दिशा में प्रयास करना शुरू किया है। इसी के तहत प्रधानमंत्री पानी बचाने, वर्शा जल संरक्षण, ड्रिप सिंचाई अपनाने और भूजल व नदी जल के संरक्षण के लिए जनभागीदारी  की अपील कर  रहे हैं। पीएम, मोदी ने इसके लिए सरकार के कार्य के साथ नागरिकों के दायित्वों के निर्वहन की भी बात कही है। जिस तरह स्वच्छता आज जन अभियान बन चुका है, उसी तरह जल संरक्षण को भी जनाभियान बनाने की आवष्यकता है। किसी भी समस्या का समाधान तब तक संभव नहीं है जब तक हम समस्याओं को संपूर्णता में, समग्रता में न सोचेंगे, और न ही उसे सुलझाने का प्रयास करेंगे। पीएम ने प्रदर्षन के दौरान हिंसा व सम्पतियां के नुकसान पर भी चिंता जताई है। उन्होंने हिंसा-उपद्रव करने वालों से खुद के अंदर झांकने की अपील कही है कि वे स्वयं से पूछें कि उनका रास्ता सही है। यह सही है कि जिस तरह पिछले कुछ दिनों में नागरिकता कानून के विरोध में प्रदर्षन देश में हिंसा हुई व सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया, वह कतई स्वीकार्य नहीं है। लोकतंत्र हमेशा शांतिपूर्ण अहिंसक प्रदर्षन की इजाजत देता है, हिंसा से किसी समस्या का समाधान संभव नहीं है। उम्मीद है लोग पीएम की अपील को समझेंगे और जल संरक्षण की अपनी आदत बनाएंगे और प्रदर्षन करने वाले हिंसा-उपद्रव का रास्ता नहीं अपनाएंगे।


 


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